अपने विस्थापन को विकास समझ लिया है - Ravish Kumar

August 20, 2019
यह एक नया न्यूज़ रूम है जहाँ मैं हर मिनट होता हूँ। लोगों को पढ़ता हुआ अपने संसाधनों और समय की सीमा के अफ़सोस से जूझता रहता हूँ। सवाल दिखाने भर का नहीं है। यह सवाल अब सुन्न हो चुका है। जनता कितने मुद्दों पर संवेदनशील रहे और आक्रोशित हो। दर्शक विस्थापित हो चुके हैं या उन्होंने अपने विस्थापन को विकास समझ लिया है।
जनता के साथ संपादकीय बैठक समझिए। कोई भी चाहें तो ये ख़बरें कर सकता है। बिहार, यूपी, हरियाणा, राजस्थान से हैं। इन्हें अवश्य पढ़ें। पता चलता है कि लोग अपने आस पास की स्थितियों पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। लेकिन इसी से सारा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इन बातों से उनके बीच मीडिया को लेकर एक समझ तो दिखती है पर क्या उनकी यही एक समझ है? वो जब मीडिया को देखते हैं, अख़बार या चैनल तो उसे कैसे देखते हैं, क्या देखते हैं, और फिर मीडिया क्या कर सकता है और क्या करता है ऐसे लोगों के लिए। ख़बरें छपती हैं तब भी समाधान नहीं होता है। हो सकता है मेसेज लिखने वाले अपने मोहल्ले, गाँव में अकेले हों। उनका इलाक़ा भी ऐसी समस्याओं को लेकर उदासीन हो चुका हो। इनबॉक्स की ख़बरें हैं। पर सुंदर है देखना कि इन लोगों में सवाल धड़क रहे हैं। एंकर और दर्शक के अंतर्संबंधों को भी समझना चाहिए। इसी के लिए ये संग्रह कर रहा हूँ। हो सकता है ऐसा ही संवाद बाकी एंकरों से भी होता होगा।
1. रवीश जी, मैं xxx जिला बहराइच का निवासी हूँ।
बहराइच और श्रावस्ती के जंगलों की कटान बहुत तेजी से हो रही है, मुझसे तो बर्दास्त नहीं हो रहा , मैं चाह कर भी कुछ नही कर सकता क्योंकि मैं एक आम आदमी हूँ। वन माफिया उप के पिछड़े जिलों में फैले वनों को निशाना बना रहा है वन विभाग भी इसमें शामिल रहता है, क्योंकि हर रोज़ न्यूज़ पेपर के एक कोने में कटान की खबर छपी रहती है पर कोई एक्शन नही हो रहा।
मेरी बात पर यकीन न हो तो किसी भी दिन आप तराई क्षेत्र के न्यूज़ खोज के देखिये, आपको यकीन आ जायेगा, जब कन्फर्म हो जाये तो ये बात अपने शो में कह दीजियेगा कुछ हो या न हो मेरा डिप्रेशन कम हो जाएगा।
2. रविश जी नमस्कार।।।
सर आपसे अनुरोध किया था कि हमारे गांव के मल्लाह नाम के तालाब को आप जरूर बचाये।हमारे गांव की पंचायत ने अपने स्वार्थ या लालच के लिए पास से गुजर रहे वेस्ट जुआ ड्रेन की गंदगी से भरकर पाट दिया।।।पंचायत क्या अपनी मर्जी से किसी भी तालाब को ऐसे मिटा सकती है? क्या उस कांट्रेक्टर को जिसे नाले की सफाई करनी थी,क्या कागजो पे हमारे गांव के तालाब में भरने को कहा था।।।ऐसा नही था।।।एक करोड़ से ज्यादा उसे गंदगी कही और डालने का कॉन्ट्रैक्ट था।।।।कृपा आप हमारे गांव के तालाब को बचाये।।।।।गांव-सांखौल,तहसील बहादुरगढ़ ज़िला-झज्जर,हरियाणा
3. Sir PSU me transfer ke Kya rule hote hai main up me school teacher hu husband HAL nasik me hai last 10 yrs se transfer ka try kar rahi hu but nahi ho raha
4.sir i am Railway emplyee..
west central railway Bhopal division..
post.- pointsmenduty hours-12 hrs. daily.sir 8 hrs duty ke liye kuch solution bataiye sir...
5. राजस्थान में मेडिकल कॉलेज की फीस के बारे मे तो आप को जानकारी होगी ही.....मेरे 5 साल की कॉलेज लाइफ में कभी पीने का साफ पानी तक नही मिला हमेशा पानी की बोटल लानी पड़ती थी.....किस से शिकायत करे किसी से कहते तो यही जवाब मिलता इतनी कम फीस में mbbs कर रहे हो यह क्या काम है....एक बार हेल्थ सक्रेटरी हमेशा होस्टल म आये थे तो हालात देखकर बोले अगर मुझे 5 लाख रुपये भी दे तो भी में मेरे बचे को इस होस्टल नही रखु.... हर रोज खुद को सफाई करनी पड़ती थी ....नाहा ने के पानी के लिए भी दूसरे होस्टल में जाना पड़ता था....और sir खाने का तो पूछना ही मत.....बस मन मे यह मान लेते थे यार मेडिकल कॉलेज मिल गुण है dr बन रहे है तो यह सब झेलना ही पड़ेगा.....और जूनियर रेजिडेंट की हालत तो आप ने देख ही लेगी। किस से कहे कोई सुनने वाला नही sir....सरकारें आती और चली जाती है...मूलभूत जरूरते भी पूरी नह होती .....सुविधाओं की बात करते है
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जीडीपी 2.5 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है - Ravish Kumar

August 20, 2019
अरविंद अब भी अड़े हैं कि जीडीपी 2.5 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है
आपको याद होगा कि मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यण ने कहा था कि 2011 से लेकर 2016 के बीच जीडीपी का डेटा सही नहीं है। जो बताया गया है वो 2.5 प्रतिशत अधिक है। उनके दावे के आधार पर कई प्रश्न उठे थे जिसका जवाब अरविंद ने दिया है। बताया है कि 2011 से 2016 के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को कई गंभीर झटके लगे हैं। निर्यात ध्वस्त हो गया, बैंक घाटे में आ गए, कारपोरेट का अतिविस्तार, सूखा और नोटबंदी। इसके बाद भी इस दौरान जी डी पी 7.7 प्रतिशत से घट कर 6.9 प्रतिशत पर ही आई। ऐसा हो ही नहीं सकता कि इन बड़े झटको के बाद भी जी डी पी पर मामूली असर पड़े। उनके सवाल अंग्रेज़ी के कुछ अख़बारों में विस्तार से छपे हैं। उनका कहना है कि यूपीए 2 के आखिरी वर्षों में कहा जाता था कि नीतियों को लकवा मार गया है। लेकिन उसी दौर में उत्पादकता भी बढ़ी हुई है। संभव तो यही है कि इस दौरान उत्पादकता भी काफी घट गई होगी। और अगर उत्पादकता बढ़ी थी तो फिर उसे कंपनियों के मुनाफे में झलकना था जो कि नहीं हुआ।
मोबाइल उत्पादन को लेकर सरकार क्या सही बोल रही है?
फाइनेंशियल एक्सप्रेस के ऋषि रंजन काला की रिपोर्ट है। 2017-18 में इलेक्ट्रानिक मंत्रालय ने कहा ता कि 120 कंपनियां हैं जो मोबाइल फोन और उनके पुर्ज़े बनाती हैं। फरवरी 2019 में जब नेशनल पॉलिसी ऑन इलेक्ट्रानिक बनाई गई तब कहा गया कि मोबाइल हैंडसेट और पुर्ज़े बनाने वाली कंपनियों की संख्या 268 हो गई है। यह सारा कुछ पिछले 3-4 साल में हुआ है। दिसंबर 2018 में प्रधानमंत्री कहते हैं कि 120 कंपनियां मोबाइल बना रही हैं। 1 फरवरी 2019 के अंतरिम बजट में वित्त मंत्री ने इसकी संख्या 268 बताई।
जब फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने पड़ताल की तो पा चला कि भारत में 127 यूनि हैं जो मोबाइल फोन बनाती हैं। इनमें से मात्र 41 प्रतिशत आपरेशनल हैं यानि चालू हालत में हैं। 65 यूनिट में से 55 प्रतिशत तो केवल बैटरी बनाती हैं। 85 कंपनियां चार्जर बनाती हैं।
संवाददाता ने जब मंत्रालय से पूछा कि कितनी कंपनियां या यूनिट मोबाइल फोन का उत्पादन कर रही हैं तो जवाब नहीं मिला। संवाददाताओं के ज़्यादातर सवालों के जवाब यही होते हैं। यही नहीं इन कंपनियो को ब्यूरो ऑफ स्टैंडर्ड में पंजीकरण कराना होता है, उनके पास भी आंकड़े नहीं हैं।
नेशनल पॉलिसी ऑन इलेक्ट्रानिक 2019 के अनुसार भारत में हैंडसेट का उत्पादन 2014-15 में 6 करोड़ से बढ़ कर 2017-18 में 22.5 करोड़ हो गया। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 6.7 लाख लोगों को काम मिला।
2015 में पूरी तरह से तैयार मोबाइल फोन के सामानों का आयात 8 अरब डॉलर का हुआ था। 2018 में 3.5 अरब डॉलर का रह गया। यानि काफी घट गया। दूसरी तरफ मोबाइल फोन के सामान का आया 2.8 अरब डॉलर से बढ़कर 11.6 अरब डॉलर हो गया। इस साल कुछ कम हुआ है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी पिछले साल ऐसी रिपोर्ट छपी थी। जिसके बारे में हमने फेसबुक पेज पर लिखा था।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस के पत्रकार ऋषि रंजन काला कहते हैं कि आर टी आई के जवाब में बताया गया कि 342 यूनिट हैं। कुछ ओवरलैप हो सकता है इसलिए मंत्रालय ने यूनिट की संख्या 268 ही बताई। जैसे 15 ऐसे यूनिट हैं जिन्होंने अपना पंजीकरण मोबाइल फोन और बैटरी पैक बनाने के लिए कराया है। एक ही कंपनी दो काम कर रही है तो एक ही गिना जाए। काला साहब लिखते हैं कि इन्हें 1 गिना जाना चाहिए।
BIS की वेबसाइट पर इस कोई हिसाब नहीं है कि कितने मोबाइल फोन का उत्पादन होता है। लेकिन इसका हिसाब है कि कितने यूनिट चालू हैं और कितने बंद हो चुके हैं। इसके अलावा ऋषि रंजन काला ने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी के डेटा से भी चेक किया है।
एक कंपनी है राइज़िंग स्टार्स मोबाइल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड जो मोबाइल फोन बनाती है। BIS की साइट बताता है कि महाराष्ट्र में इस कंपनी की एक यूनिट है जिसका पंजीकरण लैप्स हो गया है। आंध्र प्रदेश में भी दो यूनिट हैं। जहां कई कंपनियों के फोन बनते हैं।
आंकड़ों को लेकर झांसेबाज़ी कामयाब होती रहेगी। ऐसे विश्लेषण जनता के बीच पहुंचते ही नहीं है। अब देखिए एक खबर है कि बंगलुरू सबसे डिजिटाइज़्ड शहर है। हेडलाइन देखकर आप खुश हो जाएंगे। लेकिन यह तमगा इसलिए मिला है कि वहां सबसे अधिक कार्ड पेमेंट होता है। क्या इससे कोई शहर डिजिटाइज़्ट घोषित किया जा सकता है? उस शहर की हालत जाकर देखिए। ट्रैफिक जाम से तो प्राण ही निकल जाए।
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अर्थव्यवस्था में नौकरी, सैलरी और सरकार के पास पैसे नहीं है - Ravish Kumar

August 20, 2019
सबकुछ काफी ठीक है बस अर्थव्यवस्था में नौकरी, सैलरी और सरकार के पास पैसे नहीं है।
जून में निर्यात का आंकड़ा 41 महीनों में सबसे कम रहा है। आयात भी 9 प्रतिशत कम हो गया है। जो कि 34 महीने में सबसे कम है। सरकार मानती है कि दुनिया भर में व्यापारिक टकरावों के कारण ऐसा हुआ है।
सरकार ने 2018-19 और 2019-20 के दौरान पेट्रोलियम उत्पादों पर सरचार्ज लगाकर 17000 करोड़ वसूले हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि सरकार इस पैसे का दूसरे मद में इस्तमाल करेगी। जिन चीज़ों के लिए सरजार्च लिया गया था उसमें नहीं। कायदे से यह पैसा राषट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को जाना चाहिए था, खासकर एक ऐसे समय में जब हाईवे के लिए पैसे की तंगी हो रही है। अपना पैसा कहीं और खपा कर परिवहन मंत्रालय निजी आपरेटरों की तलाश में लगा है।
सरकार संप्रभु बॉन्ड के ज़रिए विदेशों से कर्ज़ उठाने की तैयारी में है। बजट में घोषणा हुई है। बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर है कि सरकार धीरे धीरे कर्ज़ लेने की दिशा में कदम उठाएगी। हांगकांग, न्यूयार्क, सिंगापुर और लंदन में ये बान्ड लांच होंगे। 20 साल के लिए यह बान्ड जारी होगा। शुरूआती चरण में सरकार 3-4 अरब डॉलर का कर्ज़ उठाने की कोशिश करेगी। भारत जीडीपी का मात्र 5 प्रतिशत संप्रभु बान्ड के ज़रिए विदेशों से कर्ज़ लेता है। जो कि कम है। भारत सरकार अपने बजट को पूरा करने के लिए सात लाख करोड़ का कर्ज़ लेगी। इसे लेकर बिजनेस अख़बारों में बहस चल रही है कि ठीक है या नहीं। उम्मीद है हिन्दी के कूड़ा और चमचा अख़बार और चैनल आप दर्शक और पाठकों को इस महत्वपूर्ण विषय के बारे में जानकारी दे रहे होंगे।
आटोमोबिल सेक्टर में उत्पादन ठप्प होने और बिक्री काफी घट जाने के कारण कितनों की नौकरियां गईं हैं, इसकी ठोस जानकारी नहीं है। कभी किसी अखबार में 25,000 छपता है तो कभी 30,000। इस तिमाही में बिक्री की हालत पिछले दस साल में सबसे बदतर है। पंतनगर में अशोक लेलैंड ने अपनी फैक्ट्री 9 दिनों के ए बंद कर दी है क्योंकि मांग ही नहीं है। पिछले महीने भी एक हफ्ते के लिए प्लांट बंद था। इसका असर स्टील निर्माताओं पर भी पड़ रहा है। मांग कम होने के कारण हालत खराब है। टाटा स्टील के टी वी नरेंद्ररन ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा है कि ओला और ऊबर के कारण युवा पीढ़ी कम कारें खरीदेगी। इसके कारण भी मांग घट रही है।
HIS Markit India ने एक बिजनेस सर्वे कराया है। इस सर्वे मे यह निकल कर आया है कि बिजनेस सेंटीमेंट तीन साल में सबसे कम है। प्राइवेट कंपनियों ने अपना आउट पुट ग्रोथ अब 18 प्रतिशत की जगह 15 प्रतिशत ही देख रही हैं। डॉलर के सामने रुपया कमज़ोर हो रहा है इसलिए आयात महंगा होता जा रहा है। मांग कम होने के कारण सरकार की नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं।
कर्ज़ न मिलने के कारण रियल स्टेट सेक्टर की भी हालत ख़राब है। 20 प्रतिशत ब्याज़ पर लोन लेने पड़ रहे हैं।
कारपोरट की कमाई घट गई है। भारत की चोटी की कंपनियों ने बताया है कि कर्ज़ का अनुपात बढ़ता ही जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की भी हालत खराब है। जिस अनुपात में कर्ज़ बढ़ रहे हैं उस अनुपात में शेयरधारकों की कमाई नहीं हो रही है। जिसके कारण उनका बैलेंसशीट कमज़ोर हो गया है।
महेश व्यास ने लिखा है कि 2017-18 मे कंपनियों में रोज़गार वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत ही रही। 2016-17 में 2.6 प्रतिशत थी। जबकि यह बेहतर आंकड़ा है पिछले वर्षों की तुलना में। रोज़गार घटा है। लेकिन मज़दूरी थोड़ी बढ़ी है। महेश लिखते हैं कि मात्र 46 प्रतिशत कंपनियों ने ही रोज़गार वृद्धि दर्ज की है। 41 प्रतिशत कंपनियों में रोज़गार घटे हैं। 13 प्रतिशत कंपनियों में रोज़गार में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
महेश व्यास लिखते हैं कि नौकरी मिलने और सैलरी बढ़ने का स्वर्ण युग 2003-04 से 2008-09 ही था। 2013-14 तक कोरपोरेट सेक्टर में रोज़गार बढ़ता रहा। जब भी जीडीपी 7 प्रतिशत थी। मज़दूरी 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी और रोज़गार 3.5 प्रतिशत की दर से। यानि 7 प्रतिशत जीडीपी का असर दिखता था। इसकी तुलना मौजूदा सरकार की 7 प्रतिशत जीडीपी दौर में ऐसा नहीं लगता है। रोज़गार घट रहा है और मज़दूरी काफी कम बढ़ रही है। महेश व्यास ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है।
इसके अलावा भारत में सब ठीक है।
जियो का भी गांवों में ग्रोथ सबसे अधिक है। वोटाफोन और एयरटेल ने लाखों उपभोक्ता बढ़ा दिए हैं।
ठीक होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है।
2019 का चुनाव दुनिया का लैंडमार्क चुनाव था। 45साल में सबसे अधिक बेरोज़गारी का मुद्दा पिट गया। बेरोज़गारों ने बेरोज़गारी के सवाल को ही ख़ारिज कर दिया। उन्हें बेरोज़गार रहना पसंद था मगर मोदी का हारना नहीं। बीजेपी को शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि युवा उनसे नौकरी नहीं मांगते हैं। ऐसी किस्मत दुनिया में किसी भी पार्टी को नसीब नहीं हुई है। सारे गठबंधन हवा में उड़ गए। बेरोज़गारी मज़ाक का मुद्दा है। ऐसा सिर्फ नरेद्र मोदी की प्रचंड लोकप्रियता और उनके नेतृत्व में गहरी आस्था के कारण हो सका।
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क्या सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम करना शानदार उपलब्धि है? - Ravish Kumar

August 20, 2019
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की ख़बर है कि मंगलवार को गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में मंत्रियों के समूह की बैठक हुई थी। इसमें BSNL और MTNL जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को पटरी पर लाने के उपायों पर विचार किया गया। अब स्पेक्ट्रम बेचकर पैसा कमाने के सरकार के दिन लद गए हैं। अब इसकी संभावना बहुत कमज़ोर हो चुकी है कि सरकार टेलिकाम स्पेक्ट्रम अधिक दाम पर बेचकर खज़ाना भर सकेगी। सरकार के सामने यह सवाल है कि क्या इन कंपनियों में पैसा डाला जाए या फिर बंद कर दिया जाए।
एक विकल्प है कि BSNL और MTNL को 4 जी स्पेक्ट्रम दे दिया जाए। लेकिन इससे भी ये कंपनियां पटरी पर नहीं आएंगी। BSNL ने आखिरी बार 2008 में मुनाफा कमाया था। उसके बाद से यह कंपनी 82,000 करोड़ का घाटा झेल चुकी है। दिसंबर 2018 तक यह आंकड़ा 90,000 करोड़ के पार जा सकता है। इसके कर्मचारियों पर राजस्व का 66 प्रतिशत खर्च होने लगा है जो 2006 में 21 फीसदी था और 2008 में 27 फीसदी था।
प्राइवेट टेलिकाम कंपनियों में कर्मचारियों पर राजस्व का 5 प्रतिशत ही ख़र्च होता है। कभी BSNL के पास 37,200 करोड़ का कैश भंडार था। आज यह 8600 करोड़ के घाटे में है। इसी पर फाइनेंशियल एक्सप्रेस के संपादक सुनील जैन ने ट्विट किया है कि एक ही रास्ता है कि 80 फीसदी कर्मचारी हटा दिए जाएं। इस 80 फीसदी में कई हज़ार कर्मचारी आते हैं।
बिजनेस स्टैंडर्ड में एक के भट्टाचार्य का लेख है। 2014 में जब मनमोहन सिंह ने सरकार छोड़ी तब कर्मचारियों की संख्या 34.5 लाख थी। मोदी सरकार ने तीन साल तक शानदार काम किया और कर्मचारियों की संख्या घटाकर 32.3 लाख कर दिया। कर्मचारियों की संख्या घटाने की तारीफ़ की गई है। भट्टाचार्य लिख रहे हैं कि मोदी सरकार ने 2014-15 में कर्मचारियों की संख्या में 4 प्रतिशत की कटौती कर दी। मगर उसके बाद कर्मचारियों की संख्या घटाने की रफ्तार कम होती चली गई। फिर भी तीन साल के भीतर ढाई लाख कर्मचारियों की संख्या घटना शानदार उपलब्धि थी। फिर भी मोदी सरकार सरकारी कर्मचारियों की संख्या घटाने में वाजपेयी सरकार के आगे कहीं नहीं ठहरती है। वाजपेयी सरकार ने 2000-01 में 13 प्रतिशत कर्मचारी कम कर दिए थे। 2011-12 में मनमोहन सिंह ने 6.2 प्रतिशत की कटौती की थी।
लेखक को चिन्ता है कि मोदी सरकार ने अपनी उपलब्धियों को आखिर के दो साल में पानी फेर दिया। जब सरकारी कर्मचारियों की संख्या बढ़ने लगी। 2018-19 तक आते आते सरकारी कर्मचारियों की संख्या 36 लाख से अधिक हो गई। इस बात पर ए के भट्टाचार्य चिंतित हैं। आयकर विभाग, पुलिस, रेलवे और नागरिक सुरक्षा में आखिरी साल में दो लाख से अधिक कर्मचारी भर्ती किए गए। रेलवे में 99,000 वेकेंसी आई।
ए के भट्टाचार्य हिन्दी न्यूज़ की दुनिया से नहीं है वर्ना वे प्राइम टाइम की नौकरी सीरीज़ को भी दोषी ठहराते कि महीनों दिखाने से सरकारें दबाव में आ गईं और चुनाव को देखते हुए भर्तियां निकलाने लगीं। मैं बच गया। इतने पर भी लेखक इस सवाल का जवाब पूछ रहे हैं कि क्या चुनाव के कारण ऐसा किया गया। बिल्कुल चुनाव के कारण किया गया तभी तो युवाओं ने मोदी सरकार को वोट किया। नौकरी मिली और नौकरी मिलने की उम्मीद में। शुरू के तीन साल में जो नौकरियां नहीं निकलीं, उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा था। आखिरी वक्त में भर्तियां निकालने से युवाओं की नाराज़गी कम हुई।
ए के भट्टाचार्य को सवाल यह पूछना चाहिए था कि क्या शुरू के तीन साल में युवाओं को नौकरियां नहीं चाहिए। ये और बात है कि इस सवाल से युवाओं को फर्क नहीं पड़ता है। वे तब भी प्रधानमंत्री मोदी को ही वोट देते फिर भी एक लेखक को किसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए। नौकरी के या नौकरी की कटौती के। पूछना चाहिए कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का हाल खस्ता किसके कारण हुआ, और इसका लाभ किसे मिला, इनके बेचने पर किसे लाभ मिलेगा। लेखक ने लिखा है कि मोदी सरकार ने एक सार्वजनिक कंपनी की हिस्सेदारी दूसरी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी को बेचकर दो लाख करोड़ से अधिक की कमाई की मगर निजीकरण नहीं किया। मनमोहन सिंह ने भी 90,000 करोड़ की कमाई की मगर निजीकरण नहीं किया।
आज सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां चरमरा गईं हैं। इनकी नौकरी की चमक फीकी हो गई है। बैंकों की भी हो गई है। यह सब लिखने का यह मतलब नहीं है कि बैंक से लेकर सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी मोदी विरोधी हो जाएंगे या थे लेकिन आर्थिक प्रक्रियाओं को दर्ज तो करना ही होता है। मैं खुद जानता हूं कि बैंक सेक्टर के लोगों ने मोदी सरकार को पूरा समर्थन दिया है। सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या इस समर्थन से उत्साहित होकर इस बार मोदी सरकार इन कर्मचारियों पर मेहरबानी बरसाएगी?
बिजनेस अखबारों को पढ़ा कीजिए। उनमें इसकी वकालत की जा रही है कि कर्मचारियों को निकाला जाए। सरकार के ख़र्चे का बोझ कम किया जाए। तभी कहता हूं कि हिन्दी के पाठकों को बिजनेस की ख़बरों को समझना चाहिए। इस तर्क का अंध विरोध करने से पहले परिस्थितियों को भी समझना होगा। आज सरकार के पास पैसे नहीं है। उसने कमाने के लिए जो बान्ड जारी किए हैं उसी से वह उपभोक्ताओं को मुनाफा नहीं दे पा रही है। अब वह विदेशों से बान्ड खरीदने जा रही है। दुनिया की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। अगर विदेशों में बान्ड बेचकर पैसा नहीं आया तो सरकार के सामने क्या चुनौतियां होंगी। यह समझना होगा।
बिजनेस स्टैंडर्ड लगातार रिपोर्ट कर रहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और प्राइवेट कंपनियों का मुनाफा घटता जा रहा है। उनके कर्ज़े का बोझ बढ़ता जा रहा है। सभी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का कुल कैश 12.8 प्रतिशत कम हो गया। उनका कर्ज़ा 13.5 प्रतिशत बढ़ गया है। इन कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी ही अधिक है। लिहाज़ा घाटा सरकार को होगा। इन कंपनियों का वैल्यू कम होगा, बेचने पर भी दाम कम मिलेंगे। फिर सरकार का घाटा और ज़्यादा बढ़ेगा।
बिजनेस स्टैंडर्ड अपने संपादकीय में सरकार को श्रेय देता है कि उसने इन कंपनियों को संभालने की बात की है। कहा है कि वह रणनीतिक विनिवेश करेगी। लेकिन सरकार सारा ज़ोर विनिवेश के ज़रिए कैश हासिल करने पर न दे बल्कि इन कंपनियों को आज के बाज़ार से कमाई करने के लिए सक्षम बनाए।
आने वाले दिन चुनौतियों भरे हैं। अगर इस प्रक्रिया में देरी हुई तो नौकरियां और कम होंगी। जिनकी हैं उनकी खराब होगी। सैलरी नहीं बढ़ेगी और उल्टा जा भी सकती है। यह तो किसी के साथ नहीं होना चाहिए।
आज के ही अख़बार में छपा है कि सुज़लॉन कंपनी ने 172 मिलियन डॉलर लोन के डिफाल्ट का एलान किया है। अब इसका असर बैंकों पर तो पड़ेगा ही। आज कल लाख, करोड़ लिखने का चलन बंद हो गया है। सरकार भी मिलियन और ट्रिलियन बोलने लगी है। बिजनेस स्टैंडर्ड में यह भी ख़बर है कि सरकार ने जो बान्ड जारी किए हैं उनका रिटर्न 30 महीने में सबसे कम है।
इस बीच वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने राज्य सभा में बताया है कि मुद्रा लोन का 17,651 करोड़ एन पी ए हो गया है। प्रतिशत में तो 2 प्रतिशत ही है लेकिन 17,651 करोड़ का एनपीए कम नहीं होता है। मंत्री ने कारण भी बताए हैं। बिजनेस फेल हो गया। लोन देने की प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं हुआ। अब मंत्री यह तो नहीं बताएंगे कि बैंकों पर मुद्रा लोन देने का दबाव डाला गया। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप की मदद से लोन दिलाए गए। बीजेपी यह तो बताती है कि मुद्रा लोन देने से कितनों को रोज़गार मिला लेकिन यह भी बता सकती है कि 17,651 करोड़ का लोन एनपीए हुआ, बिजनेस फेल हुए तो कितनों का काम छिन गया।
आर्थिक ख़बरों में ख़ुद को सक्षम कीजिए। इससे बेहतर समझ मिलेगी कि आपका भविष्य किस दिशा में जा रहा है। सरकार के सामने चुनौतियां हैं मगर उसकी भाषा में चिन्ता बिल्कुल नहीं है। होनी भी नहीं चाहिए। जनता आर्थिक नतीजों को न समझती है और न ही इसके आधार पर जनमत का निर्माण करती है। भले ही नौकरियां न हो, लेकिन जय श्री राम बोलकर राजनीति का टोन सेट तो किया ही जा सकता है। यह एक सफल फार्मूला भी है।
इस सवाल पर सोचिए कभी कि आखिर हिन्दी जगत में इन खबरों पर चर्चा क्यों नहीं होती है। क्यों नहीं बिजनेस के अच्छे अखबार है। होते भी तो उनमें भी यही वकालत होती कि सरकार जल्दी से अपने कर्मचारियों की संख्या घटाए। कर्मचारियों की संख्या घटती तो उनके संपादक लिखते कि सरकार ने शानदार काम किया है। फिर इसे हिन्दी का पाठक और मतदाता कैसे पढ़ता, क्या वह भी इन संपादकों की तरह स्वागत करता है। कस्बों में ये बातें पहुंचनी चाहिए
क्या सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम करना शानदार उपलब्धि है? - Ravish Kumar क्या सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम करना शानदार उपलब्धि है? - Ravish Kumar Reviewed by Subham Thakur on August 20, 2019 Rating: 5

नौकरियां जा रही हैं तो कोई बता क्यों नहीं रहा - Ravish Kumar

August 15, 2019
नौकरियां जा रही हैं तो कोई बता क्यों नहीं रहा, मंदी है तो कहां है मंदी
अर्थव्यवस्था के आकार के मामले में भारत का स्थान फिसल गया है। 2018 में भारत पांचवे नंबर पर आ गया था अब फिर से सातवें नंबर पर आ गया है।
31 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में ख़बर छपी है कि 2018 में भारत ने ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का स्थान प्राप्त किया था। 2017 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.65 ट्रिलियन डॉलर का था। ब्रिटेन का 2.64 ट्रिलियन डॉलर का था और फ्रांस का 2.59 ट्रिलियन डॉलर का।
अब ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आकार 2.82 ट्रिलियन डॉलर है और फ्रांस का 2.78 ट्रिलियन डॉलर का हो गया है। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.73 ट्रिलियन डॉलर का हो गया है। भारत अब सातवें नंबर पर आ गया है।
आटोमोटिव कंपोनेंट मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ने कहा है कि अगर ऑटो सेक्टर में मंदी जारी रही तो जल्दी ही दस लाख लोगों की नौकरियां जा सकती हैं। इस सेक्टर में 50 लाख लोगों को रोज़गार मिला है। इस सेक्टर में गाड़ियों के कल पुर्ज़े बनाने का काम होता है। जब यह प्रश्न पूछा गया कि क्या छंटनी शुरू हो गई है तब एसोसिएशन ने जवाब दिया कि इस सेक्टर में 70 फीसदी लोग कांट्रेक्ट पर काम करते हैं। जब मांग होती है तो काम मिलता है। इस जवाब से आपको इशारा साफ साफ मिल जाता है।
जुलाई में मारुति कंपनी की बिक्री 33.5 प्रतिशत घट गई है।
जून महीने में कोर सेक्टर का ग्रोथ चार साल में सबसे कम रहा है। 0.2 प्रतिशत। मई में इस सेक्टर का ग्रोथ रेट 4.3 प्रतिशत था। एक महीने में 4.3 प्रतिशत से 0.2 प्रतिशत आने का मतलब है बिजली की गति से फैक्ट्रियां ठंडी पड़ गई होंगी। 50 महीने में यह सबसे अधिक गिरावट है। कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, खाद, स्टील, सीमेंट और बिजली उद्योग को कोर सेक्टर कहा जाता है।
इंडियन ऑयल का सकल मुनाफा 47 प्रतिशत घट गया है।
विदेशी निवेशकों ने जुलाई महीने में भारतीय शेयर बाज़ार स 12,000 करोड़ निकाल लिए हैं। पिछले 9 महीने में यह सबसे अधिक है। अक्टूबर 2018 में 28,921 करोड़ निकाल लिया गया था। टैक्स के अलावा यह भी कारण है कि इन निवेशकों को लगता है कि भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार थम रही है। कारपोरेट की कमाई घट गई है। उपभोक्ता कम ख़रीदारी कर रहा है।
मनी कंट्रोल वेबसाइट पर क्षितिज आनंद की रिपोर्ट है। जुलाई महीने में शेयर बाज़ार का प्रदर्शन 2002 के बाद पहली बार इतना ख़राब रहा है। 17 साल में पहली बार हुआ है जब जुलाई महीने में सेंसेक्स में 5.68 प्रतिशत की गिरावट आई है। सेंसेक्स में 500 कंपनियां दर्ज हैं। 50 फीसदी कंपनियों के शेयर दो अंकों में गिरे हैं।
BSNL जुलाई महीने की सैलरी नहीं दे सका। अगस्त में देगा। 31 जुलाई को सैलरी आनी थी। नहीं आई। चेयरमैन ने कहा है कि 4-5 अगस्त को आएगी। BSNL ने 1.76 लाख कर्मचारी काम करते हैं।
अर्थव्यवस्थाएं ठीक भी हो जाती हैं मगर मोदी सरकार के दौर में अर्थव्यवस्था ख़्वाब ही दिखाते रह गई।
भारत में अरबपतियों की संख्या कम हो गई है। शेयर बाज़ार में गिरावट के कारण अरबपतियों की संपत्ति घट गई है। 2018 में ऐसे प्रमोटर की संख्या 90 हो गई थी जो अब तक की सबसे अधिक संख्या थी। लेकिन अब घट कर 71 हो गई है। इनकी भी कुल संपत्ति घट गई है। पिछले मार्च में 353 बिलियन डॉलर थी, जो 326 बिलियन डॉलर हो गई है।
एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफार्म ने बताया है कि 2018 में बीजेपी की चल अचल संपत्ति में 22 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। कांग्रेस का 15 प्रतिशत घट गया है।
अर्थव्यवस्था में ऊपर नीचे होता रहता है। बिल्कुल चिंता न करें। कल फिर ठीक हो जाएगा।
न्यूज़ चैनलों के प्रोपेगैंडा में खो जाएं। मस्त रहें। हिन्दू मुस्लिम के और भी टॉपिक आएंगे। हमारी आंखों के सामने पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं लेकिन उसका फायदा है कि लोग नौकरी के सवाल पर नहीं सोच रहे हैं।
कई लोग लिख रहे हैं कि अर्थव्यवस्था का हाल इसलिए है कि प्रधानमंत्री डिस्कवरी चैनल के किसी शो में व्यस्त हैं। यह आरोप ठीक नहीं है। प्रधानमंत्री नोटबंदी के समय तो डिस्कवरी चैनल के लिए शूटिंग नहीं कर रहे थे। वे दिन रात काम कर रहे हैं तभी यह हाल है। 5 साल में अर्थव्यवस्था को लेकर कहानी ही बनती रही। उनके काम का नतीजा दिखाई नहीं देता है। प्रधानमंत्री ने शूटिंग के लिए हाँ बोलकर ठीक किया। डिस्कवरी चैनल के बहाने कम से कम कुछ काम तो किया। शो की रेटिंग आएगी। उनकी लोकप्रियता पर बहस होगी।

भारत के नौजवान दुनिया के पहले नौजवान हैं जिन्होंने रोज़गार के सवाल को ही ख़त्म कर दिया है। उन्होंने जिस पुलवामा के नाम पर वोट दिया था उसके होने के दिन तो प्रधानमंत्री शूटिंग कर रहे थे। अच्छा हुआ कि राहुल गांधी ने यह ग़लती नहीं की वरना न्यूज़ चैनल उन जगहों पर जाकर आज तक रिपोर्ट कर रहे होते। मीडिया से भी आग्रह है कि वह ज़्यादा से ज़्यादा विपक्ष को लेकर सवाल करे। ताकि सरकार को कोई तकलीफ न हो।
जो लोग सरकारी परीक्षाओं के भरोसे बैठे हैं वे रेलवे में 3 लाख कर्मचारियों की छंटनी की ख़बर मुझ तक फार्वर्ड न करें। इन कर्मचारियों से भी हिन्दू मुस्लिम के सवाल पूछ दें, गारंटी है कि ये अपना दर्द भूल जाएंगे। लाखों लोगों की नौकरियां दांव पर हैं, लाखों लोग शांत हैं।
10 लाख लोगों का काम छिन रहा है। पता भी नहीं है कि कितने लोगों का काम ठप्प पड़ रहा है। इन लोगों ने भी हमारी टाइम लाइन पर आकर अपनी व्यथा नहीं बताई है। क्या पता बिजनेस ठंडा होते ही ये लोग फेसबुक बंद कर देते होंगे। नौकरी जाते ही लोग टीवी नहीं देखते होंगे।
जो भी है कि चिन्ता न करें। फिर से बहार आएगी। नौकरी का जाना देश के लिए अच्छा है। घर बैठकर टीवी पर और बहस देखने का मौका मिलेगा। आप पोज़िटिव फील करेंगे। ज़्यादा कोई सवाल करे कि घर क्यों बैठे हो, क्यों मोदी मोदी करते हो तो उल्टा सवाल दाग दीजिए कि राहुल गांधी के बारे में क्या राय है। कांग्रेस क्या ठीक है। पक्का उसकी बोलती बंद हो जाएगी।
नौकरियां जा रही हैं तो कोई बता क्यों नहीं रहा - Ravish Kumar नौकरियां जा रही हैं तो कोई बता क्यों नहीं रहा - Ravish Kumar Reviewed by Subham Thakur on August 15, 2019 Rating: 5

1894 में caleb gadly अपने गोरे बॉस की पत्नी के बगल से गुज़र रहे थे - Ravish Kumar

August 15, 2019
1894 में caleb gadly अपने गोरे बॉस की पत्नी के बगल से गुज़र रहे थे, इस जुर्म में अश्वेत caleb को लिंच कर दिया गया. उनकी पत्नी mary turner ने विरोध किया तो उल्टा टांग दिया गया, गर्भवती थीं, पेट चीर दिया गया. बच्चा नीचे गिर कर मर गया. Mary भी मर गयीं.
1922 में parks banks नाम के अश्वेत को लिंच किया गया. क्योंकि उनके पास किसी श्वेत महिला की तस्वीर थी.
अमेरिका में ऐसे लिंचिंग के 4400 मामलों को खोजने में bryan stevenson और कई वकीलों की टीम ने वर्षों लगा दिए. कुछ के नाम मिले और कुछ के नहीं.
इन सब के ज्ञात और अज्ञात नामों को स्टील के खम्बों पर लिखा गया है. इन खम्बों को छत से उल्टा लटका दिया गया है.
यह म्यूजियम अल्बामा के मोंटगुमरी में पिछले साल खोला गया है.
यह जानकारी प्रसून जोशी के लिए है. जब श्वेत लोग अश्वेत लोगों को लिंच कर रहे थे तब उन्हें होश नहीं था कि सौ साल बाद STVENSON जैसे वकील लिंचिंग कि 4400 क़त्ले आम को इतिहास से निकाल लाएंगे और म्यूजियम बना देंगे. भारत में जब भी ऐसा म्यूजियम बनेगा, प्रसून जोशी के पत्र को उल्टा लटके स्टील के खंभों पर चिपका दिया जाएगा.लिंच किये गए लोगों के नाम के बगल में प्रसून का भी पत्र होगा.
लोग पढ़ेंगे कि लिंचिंग पर सवाल उठाने वालों को कौन लोग टुकड़े टुकड़े गैंग बता रहे थे और कौन लोग लिंचिंग के अपराधियों को जेल से बाहर आने पर लड्डू खिला रहे थे.
लिंचिंग म्यूजियम की जानकारी new york times की रिपोर्ट से मिल जाएगी. कोई चाहे तो brayan stevenson को श्याम बेनेगल के साथ 49 लोगों के पत्र और प्रसून जोशी के साथ 60 लोगों के पत्र को भेज दे और उनसे आग्रह करे कि इन दोनों पत्रों को पढ़ने के बाद इन्हें अपने लिंचिंग म्यूजियम में जगह दें.
बाक़ी प्रधान मंत्री को किसी चीज़ की परवाह करने की ज़रूरत नहीं है.प्रसून जोशी गीत लिख रहे हैं.
तस्वीर मेरे परिचित के कैमरे की है. आप इस्तेमाल कर सकते हैं
1894 में caleb gadly अपने गोरे बॉस की पत्नी के बगल से गुज़र रहे थे - Ravish Kumar 1894 में caleb gadly अपने गोरे बॉस की पत्नी के बगल से गुज़र रहे थे - Ravish Kumar Reviewed by Subham Thakur on August 15, 2019 Rating: 5

कैमरे में हिमा दास का इतिहास है, उसकी जीत के क्षणों की रिकार्डिंग नहीं - Ravish Kumar

August 15, 2019
कैमरे में हिमा दास का इतिहास है, उसकी जीत के क्षणों की रिकार्डिंग नहीं
6 मिनट के वीडियो में हिमा दास चार नंबर की लेन पर तैनात हैं। फायर होती है। कैमरा स्टेडियम के मैदान की तरफ से धावकों को दिखाता है। हिमा दास काफी देर तक दौड़ में पांचवें नंबर पर होती हैं। अचानक बहुत दूर से हिमा निकलती हुईं आती दिखती हैं। कमेंटेटर की ज़ुबान पर उनका नाम दौड़ने लगता है। वो उन चारों धावकों के करीब पहुंच जाती हैं जिनसे आगे निकलता है। तभी कैमरा अपना पोज़िशन बदलता है।मैदान के साइड एंगल से टॉप एंगल पर आ जाता है। यही वो ऐतिहासिक क्षण है जब हम हिमा को आगे निकलते हुए ठीक से नहीं देख पाते है। उन पलों में हिमा को नहीं देख पाते हैं जब वह अपनी शक्तियों को बटोरते हुए ख़ुद को खींच रही होती हैं। वह लम्हा बहुत छोटा था मगर फ़ासला बहुत लंबा था।
कई बार इस वीडियो को देख चुका हूं। मैदान की तरफ से साइड एंगल का कैमरा और कमेंटेटर की आवाज़ जिस तरह से हिमा में आगे निकलने की संभावना को देखकर उत्तेजित होती है, टॉप एंगल का कैमरा उसे ठंडा कर देता है। हिमा दास चार धाविकाओं को पीछे छोड़ते हुए निकल रही हैं। लंबी छलांग लगा रही हैं। अपना सब कुछ दांव पर लगाते इस खिलाड़ी को कैमरा दूर निगाहों से देखने लगता है। वो सिर्फ उस लाइन को क्रास करते हुए दिखाना चाहता था जिससे कोई नंबर वन होता है। काफी देर तक कैमरा सिर्फ अमेरिकन चैंपियन को देख रहा था। दौड़ के अंतिम अंतिम झणों तक अमेरिकन चैंपियन ही प्रमुखता से दिखती है। तभी उसके साये से निकलती हुई एक छाया बड़ी हो जाती है। अमेरिकन चैंपियन को पीछे छोड़ देती है।
कैमरे ने हिमा दास को जीतने का इतिहास दर्ज किया है। हिमा ने कैसे उस जीत को हासिल की है, उसका नहीं। यह भी सबक है कि कैमरे का फोकस जहां होता है वहां विजेता नहीं होता। कैमरा चाहे जितनी देर तक किसी को विजेता बना ले, हिमा दास जैसी कोई निकल आएगी। एथलिट के कवरेज में काफी तरक्की आ गई है। लेकिन फोकस खिलाड़ी से हट कर लाइन पर शिफ्ट हो गया है। सबको फाइनल रिज़ल्ट देखना है।
काश कैमरा हिमा के पांवों पर होता है। पंजों पर होता। उसकी गर्दन की नसों पर होता। हम उसके चेहरे पर बनती जीत की स्वर्ण रेखाओं को देखना चाहते थे, नहीं देख सके। हिमा दास का यह वीडियो बता रहा है कि कैमरा कैसे अपने पोजिशन से ही खिलाड़ियों में फर्क करता है। क्या कैमरे की तकनीक इतनी विकसित नहीं हुई है कि उस 59 सेकेंड हम 8 धाविकाओं को दिखा सकें। बाद में तो दिखा ही सकते थे। आयोजक को हर खिलाड़ी का मोमेंट अलग से रिकार्ड करना चाहिए और विजेता का अलग से बनाकर बाद में जारी करना चाहिए था।
बस यही कि हम भारत की हिमा को जी भर कर देखना चाहते थे। मन तो भर गया लेकिन जी नहीं भरा है।
कैमरे में हिमा दास का इतिहास है, उसकी जीत के क्षणों की रिकार्डिंग नहीं - Ravish Kumar कैमरे में हिमा दास का इतिहास है, उसकी जीत के क्षणों की रिकार्डिंग नहीं - Ravish Kumar Reviewed by Subham Thakur on August 15, 2019 Rating: 5
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